Tyre import सस्ता, तेल सस्ता, रबड़ सस्ता पर सस्ते क्यों नहीं होते टायर

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टायर कम्पनियां सरकार पर कच्चे रबड़ के आयात पर टेक्स घटाने और सस्ते Tyre Import पर Anti Dumping Duty लगाने के लिये दबाव डाल रही हैं दूसरी ओर टायर डीलरों की फैडरेशन ने टायर इम्पोर्ट बढऩे और इससे इंडस्ट्री को नुकसान पहुंचने के कम्पनियों के दावे को खारिज करते हुये कहा है कि कम्पनियां इस मामले में फालतू हौवा खड़ा कर रही हैं। Tyre Dealers Federation ने कम्पनियों पर साठगांठ कर कीमतें तय करने और कच्चा माल सस्ता होने के बावजूद प्राइस कम नहीं करने का भी आरोप लगाया है।

आत्मा का 20 अप्रेल को जारी बयान: फैडरेशन के हमले का आत्मा ने ताजा बयान में जबाव देते हुये कहा है कि पिछले वित्त वर्ष में देश में ट्रक-बस रेडियल यानि टीबीआर Tyre Import आयात में 64 फीसदी का उछाल आया है ऐसे में सरकार का एंटी डम्पिंग ड्यूटी लगानी चाहिये। ATMA के अनुसार पिछले वित्त वर्ष में टीबीआर का आयात 7.8 लाख से बढक़र 12.8 लाख हो गया। चीन भारत में टायरों की डम्पिंग कर रहा है और कई बार ये चीन के बाजार में जिस कीमत पर बिकते हैं उससे भी कम में भारत में आते हैं। कुछ मामलों में चीन में बने टायरों की कीमत भारत में बने टायरों की इनपुट लागत से भी कम होती है। आत्मा का दावा है कि दो साल में टीबीआर इम्पोर्ट ढाई गुना हो चुका है। 2014 में हर महिने 40 हजार टीबीआर भारत आ रहे थे जो 2015 में 65 हजार और 2016 में 1 लाख तक पहुंच गये। आज देश के टीबीआर रिप्लेसमेंट मार्केट में यदि 100 टायर बिकते हैं तो उनमें 30-40 फीसदी मेड इन चायना हैं। 

ऑल इंडिया टायर डीलर्स फैडरेशन (AITDF) ने पिछले तीन महिनों में टायर इम्पोर्ट घटा है। दिसम्बर में मेड इन चायना/कोरिया/थाईलैंड टायरों का इम्पोर्ट पीक लेवल पर था लेकिन मार्च में दिसम्बर और पिछले वर्ष के मुकाबले कमी आई है। यह कमी कार और ट्रक-बस रेडियल दोनों सैगमेंट के टायरों के आयात में दर्ज की गई है।

देश के मार्केट में Tyre Import का सबसे ज्यादा हिस्सा ट्रक-बस रेडियल यानि टीबीआर सैगमेंट में है लेकिन मार्च में इनके आयात में भी दिसम्बर के मुकाबले 29.25 फीसदी की कमी आई है। इसी तरह कार/एसयूवी आदि पैसेंजर वेहीकल्स का इम्पोर्ट भी मार्च में दिसम्बर के मुकाबले 52.83 फीसदी घटा है।

एआईटीडीएफ का आरोप है कि करीब दो साल से क्रूड ऑयल और कच्चे रबड़ की कीमतों में भारी कमी आई है ऐसे में कम्पनियों को टायरों की कीमतों में कमी करते हुये इसका फायदा कस्टमर को देना चाहिये था।

कच्चा रबड़ और क्रूड ऑयल से बना रॉ मेटीरियल टायर बनाने के लिये प्रमुख कच्चा माल होता है ऐसे में यदि ये सस्ते हो रहे हैं तो उत्पादन में भी कमी आती है।

एआईटीडीएफ के एसपी सिंह के अनुसार यदि Tyre Import से कम्पनियों को इतना ही नुकसान हो रहा है तो फिर उन्हें रिप्लेसेंट मार्केट यानि खुले बाजार मेंं टायरों की प्राइस घटानी चाहियें। इसके उलट टायर कम्पनियों द्वारा कार्टेल बनाने यानि साठगांठ करने की रिपोर्ट आ रही हैं ताकि रिप्लेसमेंट मार्केट में टायर सस्ते नहीं हो पायें।

एआईटीडीएफ के अनुसार तिमाही आधार पर देखें तो मार्च 2016 की तिमाही में पैसेंजर कार रेडियल यानि पीसीआर टायरों का आयात दिसम्बर2015 की तिमाही के मुकाबले 32.38 फीसदी घटा है। जनवरी में पीसीआर के 74 कंटेनर भारत आये थे जबकि मार्च में यह घटकर 50 ही रह गये। जनवरी में 1.11 लाख पीसीआर का आयात हुआ था जबकि मार्च में सिर्फ 75 हजार।

यर कम्पनियों द्वारा इम्पोर्टेड टायरों पर एंटी डम्पिंग ड्यूटी लगाने के लिये केंद्र सरकार पर डाले जा रहे दबाव को देखते हुये फैडरेशन ने टीबीआर और पीसीआर इम्पोर्ट के आंकड़ों में आई कमी के साथ एक रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौँपी है। इसमें कहा गया है कि इम्पोर्ट में गिरावट के ताजा आंकड़ों को देखते हुये एंटी डम्पिंग ड्यूटी लगाने की मांग व्यावहारिक नहीं है।

फैडरेशन ने यह भी कहा है कि CCI यानि कम्पीटिशन कमिशन ऑफ इंडिया द्वारा फरवरी में जारी रिपोर्ट में देश की पांच प्रमुख टायर कम्पनियों और आत्मा (Automotive Tyre Manufacturers Association) द्वारा बाजार में खुले कम्पीटिशन की भावना के नुकसान पहुंचाने की बात कही गई है। इससे साफ है कि टायर कम्पनियां एक ओर तो साठगांठ कर प्राइस फिक्सिंग कर रही हैं दूसरी ओर सरकार पर एंटी डम्पिंग ड्यूटी लगाने के लिये दबाव डाल रही हैं।

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