2020 से BS-6 emission norms: 18 फीसदी तक महंगी हो जायेंगी गाडिय़ां

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pollutionदेश में पॉल्यूशन को लेकर चल रही बहस और एमिशन नॉम्र्स को लागू करने में हुई देरी के कारण यूरोप से बहुत पीछे छूट जाने को देखते हुये भारत सरकार ने 2020 तक सीधे BS-6 emission norms लागू करने का फैसला किया है। अभी कुछ शहरोंं में BS-4 emission norms मानक लागू हैं बाकी पूरे देश में बीएस-3 लेकिन अप्रेल 2017 से पूरे देश में एक समान बीएस-4 मानक लागू किये जाने हैं। बीएस-5 के बजाय सीधे BS-6 emission norms लागू होने से कारें 8 से 18 फीसदी तक महंगी हो जाने का आंकलन है।
BS-6 emission norms and Bharat Stage road map implementationपुराने रोडमैप के अनुसार 2024 तक बीएस-5 मानक लागू होने थे। लेकिन सरकार ने इसे 2021 तक लागू करने पर भी चर्चा की थी। ऑटो इंडस्ट्री बीएस-5 के लिये 2021 पर करीब-करीब सहमति थी लेकिन बीएस-5 के बजाय सीधे BS-6 emission norms लागू करने का विरोध कर रही थी। लेकिन ऑटो इंडस्ट्री के विरोध को दरकिनार करते हुये बीएस-5 मानकों के बजाय 2020 से सीधे BS-6 emission norms लागू करने का फैसला किया है।
माना जा रहा है कि BS-6 emission norms के लिये इंजन टेक्नोलॉजी को अपग्रेड करने पर ऑटो इंडस्ट्री और तेल रिफायनरियों पर तेल कम्पनियों को 50 हजार से 90 हजार करोड़ रुपये तक इन्वेस्ट करने पड़ेंगे।
सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडक़री के अनुसार बीएस-5 के बजाय सीधे BS-6 emission norms लागू किये जायेंगे।
हालांकि कुछ महिने पहले दुनिया की सबसे बड़ी फ्यूल सिस्टम बनाने वाली कम्पनी बॉश ने कहा था कि बीएस-5 मानकों के अनुरूप टेक्नोलॉजी अपग्रेड करने और उसकी टेस्टिंग पर 5 साल लगेंगे और इतने ही बीएस-5 से BS-6 emission norms में। समय कम होने से क्वॉलिटी और सुरक्षा की समस्यायें सामने आ सकती हैं। मारुति सुजुकी के अध्यक्ष आरसी भार्गव ने बॉश की चिंताओं से सहमति जताई है।
ऑटो इंडस्ट्री का मानना है कि BS-6 emission norms लागू करने से कारें करीब एक लाख तक और ट्रक दो लाख रुपये तक महंगे हो जायेंगे। जिसका असर सेल्स वॉल्यूम पर पड़ेगा।
ऑटो इंडस्ट्री की सबसे बड़ी चिंता डीजल इंजन को लेकर है जिसे BS-6 emission norms मानकों के हिसाब से अपग्रेड करने में टेक्नोलॉजी और टेस्टिंग की चुनौतियां हैं। हालांकि पेट्रोल इंजन को एफीशियेंसी और कैटेलिटिक कन्वर्टर को सुधारकर BS-6 emission norms मानकों के अनुरूप अपग्रेड किया जा सकता है।
ऑटो इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार यूरोप के मानकों को आधार बनाकर चल रही है। जबकि यूरोप में ही यूरो-5 से यूरो-6 करने में 10 साल लगे थे। जबकि भारत में इसके लिये सिर्फ साढ़े चार साल मिलेंगे।
इंडस्ट्री की चिंता यह भी है कि सरकार पॉलिसी के मामलों में बार-बार अपना स्टेंड बदलती रही है।

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