No Honk Please: आपकी लत से 55 लाख को पड़ते हैं रोटी के लाले

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Horn

Horn Please भारत की गाडिय़ों की पहचान है लेकिन हम गुजारिश कर रहे हैं No Horn Please या फिर No Honk ! हम हिंदुस्तानियों की अंगुली में खुजली बहुत होती है और इसे मिटाने के लिये स्कूटर, बाइक, कार, ट्रक-बस के Horn बजाते रहते हैं फिर चाहे कोई वजह हो या न हो।

वैसे तो यह फ्री सर्विस है लेकिन यदि आप अंगुली की खुजली मिटाने का कुछ और उपाय कर लें व फालतू Horn न बजायें तो देश के 55 लाख गरीबों को 1 पूरे महिने भरपेट खाना मिल सकता है।

आप कहेंगे क्या झक्की आदमी है। Horn बजाने का भूखों का पेट भरने से क्या लेना-देना। लेकिन यह एक कैल्कुलेशन है जो हो सकता है आपको आसानी से हजम भी नहीं हो।

किसने: लॉयन्स क्लब इंटरनेशनल की गवर्निंग काउंसिल के मेम्बर एसके पटेल ने भारत में सडक़ पर मौजूद गाडिय़ों की कुल आबादी, Horn बजाने के औसत और Horn बजाने से बर्बाद हुई इलेक्ट्रिकल एनर्जी और बैटरी को चार्ज होने में हुई डीजल की खपत का मोटा अंदाजा लगाकर यह हिसाब लगाया है। उनका मानना है कि हम सब हिंदुस्तानी No Honk  की कसम खा लें तो देश के 245 करोड़ रूपये बर्बाद होने से बच सकते हैं। ये रकम इतनी हुई कि 55 लाख गरीबों को पूरे 1 महिने तक खाना खिलाया जा सकता है।

कैसे: पटेल के अनुसार भारत में टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर, पैसेंजर वेहीकल, ट्रक-बस आदि सभी तरह की गाडिय़ों की कुल संख्या 74.70 करोड़ (74 करोड़ 70 लाख) है। कार का Horn औसत 75 वॉट का होता है जबकि ट्रक-बस के Horn की बिजली की खपत ज्यादा होती है। स्कूटर-बाइक का Horn कम बिजली खाता है। सभी गाडिय़ों के Horn की औसत बिजली की खपत 75 वॉट मानी जा सकती है। पटेल के अनुसार एक बार में Horn औसत डेढ़ (1.5) सैकंड दबाया जाता है। ऐसे में एक बार Horn बजाने पर कुल 0.00003125 यूनिट्स बिजली की खपत होती है।

यदि एक घंटे में औसत 6 बार Horn बजाया जाता है और गाड़ी दिन में आठ घंटे सडक़ पर रहती है तो एक दिन में देशभर में कुल 1120500 (11 लाख 20 हजार 500) यूनिट्स बिजली की बर्बादी होती है।

यदि
कुल गाडिय़ां: 747000000 (74. 70 करोड़ )
एक बार में बिजली की खपत: 0.00003125 यूनिट्स
एक घंटे में 6 बार Horn बजाया जाता है
एक दिन में 8 घंटे गाड़ी सडक़ पर रहती है
तो
74700000X0.00003125X6X8=1120500 यूनिट्स
यदि एक यूनिट्स बिजली का औसत भाव 6 रुपये माना जाये तो एक दिन में Horn बजाने से बर्बाद हुई बिजली का खर्च
1120500X6=67.23 लाख रुपये
और एक साल में हुई बर्बादी
6723000X365=245 करोड़ रुपये

हम भारतीयों की दूसरी पहचान भावना पर जाने के बजाय अपना दिमाग लगाने की भी है। अब आप कहेंगे..गाड़ी आठ घंटे किसकी चलती है। छोटी गाडिय़ां ज्यादा हैं ट्रक-बस कम। Horn ज्यादातर शहरों में बजाते हैं हाईवे पर बहुत कम। अलग-अलग कम्पनियों के Horn की बिजली की खपत अलग-अलग होती है आदि..आदि । तो फिर ये पूरा हिसाब ही ज़ीरो हो गया।

आप चाहे 245 करोड़ रुपये के आंकड़े पर सवाल खड़े करें लेकिन इतना तो जरूर मानेंगे कि आप Horn बजाना छोड़ देंगे तो पटेल साहब को क्या मिलेगा? उनकी भावना पर गौर करें। इस हिसाब के जरिये उनका मकसद सिर्फ इतना  जताना है कि यह रवैया परेशानी भी पैदा करता है और बर्बादी भी लाता है फिर हम सभ्य “civilized” भी तो थोड़े काम नज़र आते हैं।  

यदि हम फैसला कर लें कि खुजली मिटाने के लिये Horn पर अंगुली नहीं दबायेंगे तो नुकसान क्या है। 55 लाख ना सही 5 लाख गरीबों का पेट भी भर जाये तो क्या बुरा है।

Audi India के चीफ रहे Michael Perschke ने 2012 में कहा था ..Obviously for India, the Horn is a category in itself. You take a European Horn and it will be gone in a week or two. With the amount of honking in Mumbai, we do on a daily basis what an average German does on an annual basis. These are certain features you have to come up with to comply with Indian conditions. The Horn is tested differently—with two continuous weeks only of honking, the setting of the Horn is different, with different suppliers. 

यानि भारत में बिकने वाली गाडिय़ों में यूरोप का Horn एक-दो सप्ताह ही चल पायेगा। मुम्बई में जितनी हॉन्किंग होती है उतनी तो जर्मनी में एक साल में भी नहीं होती। भारत में बिकने वाली गाडिय़ों के लिये Horn को अलग तरीके से टेस्ट किया जाता है पूरे दो सप्ताह Horn लगातार बजाया जाता है। Horn की सैटिंग भी अलग होती है और अलग कम्पनी से खरीदे जाते हैं। 

बेहतर है Horn बजाना छोड़ दें और No Honk की कसम खा लें। नहीं तो न चाहते हुए भी गरीब के मुँह से निवाला छीनने के गुनाह में आप भी भागीदार होंगे 

Thanks for Image : cvcdn.com

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