देखिये कितनी तेजी से गिर रही है डीजल कारों की सेल्स

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diesel demand fuel preferenceज्यादा नहीं सिर्फ चार-पांच साल हुये हैं जब डीजल कारें 1-1 साल की लम्बी वेटिंग पर थीं। लेकिन बाद के सालों में इनको लेकर दीवानगी बहुत तेजी से घटी है और पिछले वित्त वर्ष में बिकने वाली 100 कारों में से 27 ही डीजल की थीं। जबकि इन पांच सालों के दौरान देश में एसयूवी मॉडलों की सेल्स दोगुनी हो गई।

भारत सरकार की ओर से लोकसभा में रखे गये आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2012-13 में सौ में से 47 कारें डीजल वाली बिकती थीं लेकिन 2016-17 में यह सिर्फ 27 परसेंट रह गईं।

हेवी इंडस्ट्रीज विभाग के राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने लोकसभा में दिये लिखित जबाव में कहा कि सियाम के अनुसार दस साल से पुरानी डीजल कारों पर एनजीटी द्वारा लगाया गया बैन इसका प्रमुख कारण है।

सुप्रियो के अनुसार वर्ष 2013-14 में डीजल कारों की हिस्सेदारी 47 से घटकर 42 परसेंट रह गई थी और बाद के तीन सालों में भी गिरावट का यह ट्रेंड बरकरार रहा। वित्त वर्ष 2014-15 में देश में बिकने वाली 37 परसेंट कारें डीजल की थीं लेकिन जो बाद के दो सालों में लगातार घटते हुये 34 और फिर 27 परसेंट रह गई।

चूंकि डीजल कारों की हिस्सेदारी घट रही है इसका सीधा फायदा पेट्रोल वैरियेंट्स को मिल रहा है जो वित्त वर्ष 2016-17 में 73 परसेंट हो गया। जबकि 2012-13 में यह 53 परसेंट ही थी। 2013-14 में सौ में से 58 कारें पेट्रोल की बिकी थीं और 2014-15 में यह बढक़र 63 और 2015-16 में 66 परसेंट रही थी।

क्यों बढ़ा डीजल का ट्रेंड: भारत में साल 2009 में 66 परसेंट कारें पेट्रोल की बिकी थीं। कोटक इंस्टीट्यूशनल सिक्यॉरिटीज़ की रिपोर्ट कहती है कि बाद के चार साल इसमें तेज और लगातार गिरावट आई और 2013 में 100 में से सिर्फ 43 कारें ही पेट्रोल वाली बिकी थीं। यह वह दौर था जब भारत सरकार ने पेट्रोल की प्राइस से अपना नियंत्रण हटाकर डायनामिक कर दिया था यानि पेट्रोल की प्राइस इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल की कीमत से तय होने लगी थी। जबकि डीजल पर प्राइस कंट्रोल का सिस्टम ही बना रहा।

नतीजा यह हुआ कि पेट्रोल व डीजल की प्राइस में अंतर बढक़र 30 रुपये तक पहुंच गया था। इसका फायदा उठाने के लिये कार कम्पनियों ने भी ज्यादातर मॉडलों के डीजल वैरियेंट्स भी उतार दिये। साथ ही कॉम्पेक्ट एसयूवी का ट्रेंड शुरू होने से भी डीजल गाडिय़ों की डिमांड बहुत तेजी से बढ़ी थी।

लेकिन अक्टूबर 2014 में डीजल की प्राइस को भी पेट्रोल की तरह बाजार के हवाले कर देने के फैसले से डीजल रिवर्सल के इस ट्रेंड की शुरूआत हुई थी।

रिवर्स गियर: दिसम्बर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में 2 ली. से बड़े डीजल इंजन वाली गाडिय़ों की सेल्स पर 3 महिने के पाबंदी लगा दी थी लेकिन यह पाबंदी साढे सात महिने तक चलती रही। इसके बाद केरल में भी एनजीटी इसी तरह का फैसला लागू कर चुका है। आम कस्टमर में भी डीजल को लेकर चाव घट रहा है और 2020 से लागू हो रहे बीएस6 एमिशन नॉम्र्स एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित होंगे।

भारत की तरह ही दुनिया भर के देशों में भी डीजल की धुनाई हो रही है और इसकी शुरूआत सितम्बर 2015 में फोक्सवैगन एमिशन स्कैंडल का जिन्न बोतल से बाहर आने से हुई थी। अब इसी तरह के स्कैंडल की चपेट में फोक्सवैगन, रेनो, फिएट, मर्सीडीज बेंज और पजियट आदि दर्जनभर ब्रांड हैं।

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