दिल्ली में Diesel Ban: देश भगवान के भरोसे या सुप्रीम कोर्ट के

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aसुप्रीम कोर्ट ने ऑटो इंडस्ट्री को बड़ा झटका देते हुये दिल्ली-एनसीआर में पॉल्यूशन को लेकर बढ़ रहे विरोध को देखते हुये 2 लीटर से बड़े डीजल इंजन वाली पैसेंजर गाडिय़ों को बैन कर दिया है। देश के बड़े बाजार में Diesel Ban करने से महिन्द्रा, टोयोटा, मर्सीडीज और टाटा को बड़ा नुकसान होने की बात कही जा रही है।दिल्ली की आबोहवा में सांस लेना बहुत मुश्किल है इसमें कोई शक नहीं है। देश की राजधानी के ऐसे हालात चिंता का कारण बन रहे हैं। कई देशों की एम्बेसी में एअरप्यॉरीफायर लगाने पड़ रहे हैं। नॉर्वे तो दिल्ली एम्बेसी में तैनात अपने स्टाफ को हार्डशिप अलाउंस तक दे रहा है। दिल्ली में प्रदूषण के लिये गाडिय़ां भी जिम्मेदार हैं इंडस्ट्री भी और दिल्ली वालों का एटीट्यूड भी। आम नागरिक की नजर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले तो देखें तो लगता है सही दिशा में उठाया गया पहला सांकेतिक कदम है। लेकिन ऑटो इंडस्ट्री के लिहाज से यह बहुत बड़ा झटका है। ऑटो इंडस्ट्री वैसे ही 3 साल की मंदी के बाद रिकवर कर रही है और सुप्रीम कोर्ट का यह Diesel Ban फैसला उसमें बड़ा रोड़ा साबित होगा। फिर जिन गाडिय़ों की सेल्स 1 जनवरी से 31 मार्च तक नहीं हो पायेगी वे सभी बीएस-4 एमिशन नॉम्र्स वाली हैं जो इतना ज्यादा प्रदूषण नहीं फैलातीं।
Diesel Ban बड़ा झटका: सबसे ज्यादा नुकसान महिन्द्रा, टाटा, टोयोटा, ऑडी, बीएमडब्ल्यू, मर्सीडीज़ और जेएलआर को होगा। इन कम्पनियों के पोर्टफोलियो में 2 लीटर से बड़े डीजल इंजन वाले कई-कई मॉडल हैं।
महिन्द्रा के तो टीयूवी300, क्वांटो और वेरिटो को छोडक़र बाकी सभी मॉडल जिनमेंं बेस्ट सेलर स्कॉर्पियो भी है और एक्सयूवी500, जायलो, बोलेरो और थार तक शामिल है।
महिन्द्रा के अलावा सबसे ज्यादा मर्सीडीज के 11 मॉडल या कहेंं तो पूरा का पूरा पोर्टफोलियो इस पाबंदी की चपेट में आ रहा है।
टोयोटा के दोनों बेस्ट सेलर मॉडल फॉच्र्यूनर और इनोवा 31 मार्च तक दिल्ली-एनसीआर में नहीं बिक पायेंगे। टाटा की सूमो, सफारी, स्टॉर्म और आरिया पर असर पड़ेगा वहीं ह्यूंदे की सिर्फ सांता फे Diesel Ban के दायरे में आ रही है।
देश के पैसेंजर व्हीकल सैगमेंट में 70 फीसदी मार्केट शेयर पर काबिज़ ह्यूंदे और मारुति को इस पाबंदी से सबसे ज्यादा फायदा होने की बात कही जा रही है। होन्डा के एक भी मॉडल पर इस पाबंदी का असर नहीं पड़ेगा। जीएम की कैप्टिवा और टे्रलब्लेज़र 31 मार्च तक एनसीआर में नहीं बिक पायेंगी।
फोर्ड की सिर्फ एंडेवर Diesel Ban के दायरे में आती है लेकिन फिलहाल इसके नये अवतार के लॉन्च की तैयारियां ही चल रही हैं।
रोडमैप: भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा कार मार्केट है। अभी साल में 25-26 लाख गाडिय़ां बिक रही हैं और 2020 तक वॉल्यूम 40 लाख के लेवल को पार कर सकता है। ऑटो इंडस्ट्री कई साल से भारत सरकार से लॉन्ग टर्म रोडमैप की बात कर रही है। जिसमें टेक्स का भी जिक्र हो और फ्यूल पॉलिसी का भी और सेफ्टी मानकों का भी। इन दिनों ऑटो इंडस्ट्री और भारत सरकार के बीच बीएस-5 और बीएस-6 उत्सर्जन मानकों को लागू करने को लेकर खींचतान चल रही है। 2019 मेंं लागू होने वाले बीएस-5 मानकों पर तो सहमति बन चुकी है लेकिन भारत सरकार बीएस-6 मानकों को तय समय से दो साल पहले लागू करना चाहती है लेकिन ऑटो इंडस्ट्री इसका विरोध कर रही है। कारण यह बताया जा रहा है कि पहले बीएस-5 मानक के लिये टेक्नोलॉजी अपग्रेड करने पर पैसा लगाना पड़ेगा फिर तुरंत बीएस-6 के लिये। अप्रेल 2017 से पूरे देश में बीएस-4 मानक लागू होने हैं लेकिन सवाल यह भी है कि अभी सिर्फ गिने-चुने शहरों और राज्यों में ही बीएस-4 मानक वाले पेट्रोल-डीजल मिल रहे हैं।
दिल्ली का हिस्सा: अभी टोटल पैसेंजर वेहीकल सेल्स में दिल्ली का हिस्सा 7 फीसदी है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान देश में बिकी कुल 26 लाख गाडिय़ों में से 3.29 लाख ऐसी थी जिनमें 2 लीटर से बड़ा इंजन था। इनमें भी सबसे ज्यादा 1.96 लाख अकेले महिन्द्रा की थीं। अकेली दिल्ली मेंं 85 लाख रजिस्टर्ड गाडिय़ां हैं और हर रोज 1400 नई गाडिय़ां सडक़ पर आ रही हैं।
सियाम का मानना है कि हाल ही में हुये स्टडी में यह बात सामने आई है कि दिल्ली के पॉल्यूशन में सिर्फ 20 फीसदी हिस्सेदारी ही वेहीकल्स की है और इसमें भी पैसेंजर वेहीकल्स का योगदान सिर्फ 14-15 परसेंट है।
सवाल: सुप्रीम कोर्ट के इस Diesel Ban कदम से कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। पहला तो यह कि इस फौरी व औचक Diesel Ban से दिल्ली की आबोहवा में कितना सुधार आयेगा। दूसरा यह कि पॉल्यूशन के दूसरे बड़े कारणों जिनमें खुले में कचरा जलाने से लेकर दिल्ली और आस-पास चल रही इंडस्ट्रीज के लिये क्या कदम उठायें जायेंगे। तीसरा यह कि यह फैसला सिर्फ जनता के गुस्से को ठंड करने की कवायद भर है या इसके पीछे कोई तकनीकी तर्क हैं। सवाल यह भी है कि देशभर में मौजूद पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड अब तक क्या कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ गया।
ऐसे में लगता नहीं कि बाकी सभी रेगुलेटरी संस्थायें नींद ले रही हैं और सुप्रीम कोर्ट सुपर रेगुलेटर का काम कर रहा है। Photo Credit:Gizmodo

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