Auto Finance: बिना नोटिस दिये गाड़ी सीज़ नहीं कर सकती फायनेन्स कम्पनी

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consumer court loan default legal issueदेश के शीर्ष कंज्यूमर कोर्ट नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमिशन ने एक प्राइवेट फायनेन्स कम्पनी को ट्रेक्टर सीज़ करने के एक मामले में 80 हजार रुपये का हर्जा देने का आदेश दिया है। कमिशन ने अपने फैसले में साफ कहा कि फायनेन्स कम्पनी किश्त बकाया रहने पर ग्राहक को बिना नोटिस दिये गाड़ी सीज़ नहीं कर सकती।

NCDRC (नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमिशन) की एम श्रीशा की अध्यक्षता वाली सिंगल मेम्बर बेंच ने अपने फैसले में श्रीराम ट्रान्सपोर्ट फायनेन्स कम्पनी को चार सप्ताह में 9 परसेंट ब्याज़ के साथ वो रकम लौटाने का भी आदेश दिया जिसका ग्राहक ने भुगतान किया था। आदेश में आगे कहा गया है कि *मेरे विचार में ग्राहक को अपनी बात रखने का मौका दिये बिना गाड़ी को सीज़ करना नेचरल जस्टिस के सिद्धांत का उल्लंघन है साथ ही यह अनफेयर ट्रेड प्रेक्टिस यानी अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवादोष भी है और इसके लिये फायनेन्स कम्पनी की शिकायतकर्ता को हर्जाना देने की जिम्मेदारी बनती है।

अपना यह फैसला सुनाते हुये NCDRC ने कम्पनी द्वारा ग्राहक को दिये गये *वेहीकल रिपजेशन नोटिस* पर गौर किया जिसमें कहा गया था कि यह ट्रेक्टर को पकडऩे के 10 दिन बाद जारी किया गया। ऐसे में इसे रिपजेशन से पहले दिया गया नोटिस नहीं माना जा सकता है और यह नेचरल जस्टिस के सिद्धांत का उल्लंघन है।

यह मामला दिसम्बर 2009 का है जब छत्तीसगढ़ के दुर्ग निवासी सखाराम साहू ने ट्रेक्टर लेने के लिये कम्पनी से 1 लाख रुपये का लोन दिया था। इस लोन के बदले साहू ने कम्पनी को अपना ट्रेक्टर गिरवी रखा था। इस लोन के बदले साहू को 31 महिने तक हर महिने 4677 रुपये की किश्त चुकानी थी।

फायनेन्स कम्पनी ने बार-बार कहने के बावजूद किश्त नहीं चुकाने पर 15 जनवरी 2011 को ट्रेक्टर को पकड़ लिया। कम्पनी ने साहू के खिलाफ 1.30 लाख रुपये का बकाया निकाला। जबकि साहू का कहना था कि 1 लाख रुपये के लोन पर वह 80 हजार रुपये का भुगतान कर चुका है ऐसे में कम्पनी का 1.30 लाख रुपये का बकाया निकालना गलत है।

कम्पनी की इस कार्यवाही के खिलाफ साहू ने जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत की लेकिन वहां उन्हें कोई राहत नहीं मिली। जिला फोरम के आदेश के खिलाफ उन्होंने स्टेेट कमिशन में अपील की। लेकिन स्टेट कमिशन ने भी जिला फोरम के आदेश को बहाल रखा। आखिर में उन्होंने वर्ष 2014 में स्टेट कमिशन के आदेश के खिलाफ एनसीडीआरसी में अपील की।

एनसीडीआरसी ने अपने आदेश में कहा कि इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि नोटिस पर 25 जनवरी 2011 की तारीख है लेकिन नोटिस की बॉडी में ट्रेक्टर 15 जनवरी 2011 को दोपहर 2.00 बजे पकडऩे की बात कही गई है। ऐसे में साफ है कि यह नोटिस कम्पनी ने ट्रेक्टर पकडऩे की तारीख से दस दिन बाद जारी किया है जबकि वास्तव में उसे ग्राहक को गाड़ी पकडऩे से पहले नोटिस देना था इस तरह यह नेचरल जस्टिस के सिद्धांत का उल्लंघन है।

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